Tuesday, March 1, 2011

तू बस इतना करना

ऐ खुदा 
    तू बस इतना करना 
    मेरी आँखों में सपने देना 
    लाख मुश्किलें हो राहों में,
    मुझे कोशिशें करने देना,
    
    जितना हारूँ मैं 
    जीत की चाहत उतनी बढती जाये
    कोशिशों पर कोशिशें 
    हद से गुजरतीं  जाये 
    सत्य बन कर मेरे दिल में रहना 
    गलत राह पर न बढ़ने देना 
    पर हाँथ न थामना मेरा 
    मुझे कोशिशें करने देना .

    और जब मंजिल मेरी
    मुझे हासिल हो जाये
    ख़त्म सब संघर्ष 
    सारी मुश्किल हो जाये 
    तू विनम्र रखना मुझे
    अहम् में न पड़ने देना 
    तू बस इतना करना 
    फिर से नए सपने देना .

    लाख मुश्किलें हो राहों में,
    मुझे कोशिशें करने देना.
   
                          - ऋतु

Wednesday, February 16, 2011

न मंदिर में दिखाई देता है ,
न मज्जिद  में मिला करता है.
खुदा तो महबूब है मेरा ,
मेरे दिल में रहा करता है.
मैं इबादत ही नहीं इतना 
इश्क करती हूँ उससे ,
की खुद को भी देखूं आईने में ,
तो वो ही दिखाई पड़ता है.
 

इतनी सी ख्वाहिश

कुछ ऐसी बातें हैं ,
जिनकी तमन्ना का हक ताउम्र नहीं होता.
मेरी तो इतनी ही ख्वाहिश थी
की वो मेरी कब्र पर एक फूल चढ़ा देते
मैं इस कश्मकश से
कब कि निकल चुकी होती
गर एक बार इस ओर वो
अपना हाँथ बढ़ा देते.

कत्ले दिल का इल्ज़ाम,
आखिर कैसे दें उन्हें
एक दफा इस ओर
नज़रे इनायत भी न हुई
दिल ही को शौक था
ख़ुदकुशी का ,
और हमें इस दिल से
शिकायत भी न हुई.
उनके ख्वाब इन आँखों पर
पैर पसारे सोते रहे ,
और वो कब आये कब चले गए
आहट भी न हुई .

                          -  ऋतु

जाने क्या आस है ........

धरा भी उदास है,
गगन भी उदास है ,
सूखे हुए दरख्तों को
फिर भी जाने क्या आस है .

रो रो कर सदियों से
नदिया ये सूख चुकी है .
पर्वतों से टकरा-टकरा कर
जीवन से रूठ चुकी है .

संस्करों का पानी
अब यहाँ बहता नहीं है.
यह भू अब बस जंगल है
मानव यहाँ रहता नहीं है.

यहाँ सब चीखते हैं रोते हैं,
जीवन को नित ढोते हैं .
पर आवाज़ उठाते नहीं
बस ज़ख्मो को पिरोते हैं.

यह कौनसी जगह है
जहाँ बस भूख और प्यास है .
जीर्ण कंकालो पर टंगा हुआ
तार-तार हुआ लिबास है.


सूखे हुए दरख्तों को
फिर भी जाने क्या आस है ...........

                              - ऋतु

Monday, February 14, 2011

उनके इंतज़ार में हम ,
नज़रें बिछाये बैठे रहे .
उनके दर पर अपने,
सर को झुकाए बैठे रहे.
उन्हें छूकर आती हवाओं को ,
पहलू में भरने के लिए ,
हम कई अरसे तक 
बाहें फैलाये बैठे रहे.

उन मगरूर रास्तों को हम
आज भी तकते रहते हैं ,
जिन पर उनके कदमो के
निशां बाकी हैं .
उनकी तस्वीर को
दिल से लगा कर रखा है .
तभी तो बिरहा की इस
तड़प में भी जान बाकी है .

               - ऋतु

Sunday, February 13, 2011

ख्वाबों को पलकों के
घरोंदों में पलने दो ,
जो जैसा भी है , अच्छा - बुरा ,
फ़िलहाल यूँ  ही चलने दो ,
वक़्त आएगा एक दिन ...........
हर एक ख्वाब सच हो जायेगा .
कल एक खूबसूरत सुबह होगी,
ज़रा रात तो ढलने दो .
                       
                              - ऋतु